Poetry & Works - Hindi Poems

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विरह की कविताएँ
विरहा का विष

नीर मिलन बरसादे भगवन, मुरझा कमल खिलादे भगवन
प्राण न ले ले बैरन विरहा, मन का मीत मिला दे भगवन ।

 

पीड़ सही न जाये मुझसे, इत-उत मारी फिरती
मेरी विजय को निश्चित कर दे, जीवन से युद्ध करती,
मुखमंडल में प्रीतम के, तू सूर्य नया दिखला दे भगवन
मन का मीत मिला दे भगवन ।

 

अधरों पर मुस्कान जो लाये ढूँढे नैना उसको
इस विरहा सागर से कौन पार लगाये मुझको
मेरे जीवन की नैय्या का माझी कोई बना दे भगवन
मन का मीत मिला दे भगवन ।

 

अपने पराये सबने मुझसे तोड़ दिया है नाता
किसे सुनाऊ जाकर अपनी पीड़ भरी मैं गाथा
बात सुने जो मेरे मन की ऐसा कोई मिला दे भगवन
मन का मीत मिला दे भगवन ।

 

प्रतीक्षा में टूट न जाये ये साँसोंकी लड़ियाँ
घुट-घुट के मैं काट रही हूँ यह विरहा की घड़ियाँ
अति कठिन है घुट - घुट जीना, इसको सरल बना दे भगवन
मन का मीत मिला दे भगवन ।

है जग दाता, भाग्य विधाता, आस बंधी है तुझसे
भूल हुई तो बिसरा दे तू, रूठ न मुझ विरहन से
दुखिया मन से दुःख का गहरा, काला साया हटा दे भगवन
मन का मीत मिला दे भगवन ।

 

हे जग दाता, भाग्य विधाता, आस बँधी है तुझसे
भूल हुई तो बिसरा दे तू, रूठ न मुझ विरहन से
दुखिया मन से दुःख का गहरा, काला साया हटा दे भगवन
मन का मीत मिला दे भगवन ।

 

हे भोले - भंडारी शंकर, माँ शक्ति के स्वामी
सुनले मेरे मन की विनती, हे धरती के स्वामी
विष पीले विरहा का मेरी, अमृत मुझे पिला दे भगवन
मन का मीत मिला दे भगवन ।

तरसती है आँखें

साजनओर से जो पवन आ रही है
मेरे मन के आँगन को महका है ।

 

हुआ उनकी चाहत का मुझ पर वो जादू
मैं नैना उठाकर जिधर देखती हूँ
सजनवा की सूरत नज़र आ रही है ,
मेरे मन के आँगन की महका रही है ।

 

जो उनकी ही बाँहो में कटती थी रातें
जो करते थे हम प्रेम की मीठी बातें ,
उन्हीं की बहुत आज याद आरही है ।

 

सजन मेरे वापस न आएंगे जब तक
न शृंगार कोई करुँगी मैं तब तक
उमरिया यूँही बस कटी जा रही है
मेरे मन के आँगन को महका रही है ।

 

सजनवा से अपने मिलूंगी मैं कब तक
विरहा की अगन में जलूँगी मैं कब तक
विरहा की ये अग्नि बढ़ी जा रही है
मेरे मन के आँगन को झुलसा रही है ।

 

न वर्षों से मुख पे हंसी मेरे आई
दुखों से न मिल पाई मन को रिहाई
उदासी जिया पर मेरे छा रही है

 

मेरे मन के आँगन को महका रही है ।
बहुत दिन हुए अपने प्रीतम को देखें
तड़पता है मन और तरसती है आँखें
जुदाई सजन की सितम ढा रही है
मेरे मन के आँगन महका रही है ।

 

-----सिराज देहलवी

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